इश्क की गहराई में मै कुछ इस कदर खो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया
पहले तो जिन्दगी हमारी हर मोर पर मुस्कुराती रही
महबूब की बाते सुन सुन के हँसती रही गाती रही
उनकी आँखों में डूब के सदिया बीतती जाती रही
उनके धरकनो की जुवा ही हमें समझ में आती रही
जबसे दूर हुए वो हमसे अश्को का समंदर हमें डुबो गया
हसरतें बची न कुछ भी और आरजू भी खो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया
रौशनी की बात छोरो अंधेरो में भी दिल जलने लगा
काबू रहा न खुद पे कोई साँस भी रुक रुक कर चलने लगा
दिल में जबसे वो याद बन कर छाने लगी
तन्हाई हुयी संगदिल इतनी की हमें महफ़िल से डराने लगी
चांदनी रात में भी चाँद मेरा सो गया लगी
एक आग दिल में और जिन्दगी खाक हो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया................
बुधवार, 9 जनवरी 2008
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