बुधवार, 9 जनवरी 2008

दलाल लगे कविता करने, कविराज गए जंगल चरने

दलाल लगे कविता करने, कविराज गए जंगल चरने
तिरकम के लाखो गेट यहा, मालिस का उचा रेत यहाँ
नेता से मुश्किल भेट यहाँ, मंत्री का भरी पेट यहाँ
बन गए मूर्ख विद्वान यहाँ, गंजे बन गए महान यहाँ

सब नर स्वतंत्र नारी स्वतंत्र, कपरे की सब धारी स्वतंत्र
मोटर स्वतंत्र गारी स्वतंत्र, कपरे की सब धारी स्वतंत्र
पिछला जो कुछ था झूठा है, अगला ही सिर्फ अनूठा है
अनु फ़ैल फ़ैल कर फूटा है, दस्तखत की जगह अंगूठा है

अभिनेत्री बनती हैं सीता जी, अखवार बने हैं गीता जी
गिदर कुर्सी पा जाते हैं, चम्गादर मौज उराते हैं
बगुले पते हैं वोट यहाँ, कौवे गिनते हैं नोट यहाँ
बन्दर ही जग का राजा है, भोपू ही बढ़िया बाजा है

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