दिनरात चल रहा हूँ मगर मंजिल है कहाँ पता नहीं
तुफा में घिरे मेरे जीवन का साहिल है कहाँ पता नहीं
खरे होकर चौराहे पर निहार रहा हूँ दूर तक
कौन सा राह जायेगा मंजिल तक हमें पता नहीं
वक़्त ने ऐसे मोर पे लाकर खरा किया है हमको
की कदम बढ़ रहे हैं हर वक़्त मगर किधर पता नहीं
मन में हौसला है और विश्वाश भी की पहुचेंगे एक दिन
मंजिल है कितनी दूर और पहुचेंगे कब तक पता नहीं ........
मंगलवार, 8 जनवरी 2008
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें