बुधवार, 9 जनवरी 2008

जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही

जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही
अधर्मियो के वार से माँ अब चीत्कार रही
जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही

विधर्मियों के लिए ही आज यहाँ का न्याय है
धर्म की बात करना पाप है अन्याय है
असभ्यो के हाथो में सभ्यता की बागडोर है
हो सभ्यता की रक्षा कैसे ये पुकार चहुँ ओर है
संस्कृति अब खो रही भाषा अब खो रहा
ये सब देखकर भी तू, बोल कैसे सो रहा
माँ की आत्मा रक्षा हेतु अब कुलाचे मार रही
जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही

कबतक लिपटे रहोगे अन्ध्बुधि के मोह में
भारत को मिटा दे अब, सब हैं इसी टोह में
राष्ट्र हित हेतु तू क्यों कुछ बोलता नहीं
राष्ट्रहित ही धर्म है होता ये राज क्यों खोलता नहीं
धर्म से भारी पंथ हो रहा जुल्म से अन्याय से
सत्य वंचित हो रहा सत्य से और न्याय से
निष्ठा को आत्मा से क्षीण है जमीं में गार रही
जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही

कैसा पत्थर है तू, क्यों माँ के आशीष से वंचित हो रहा
घर में तेरे बैठे हैं लुटेरे, क्यों तू इसतरह सो रहा
क्या तुझमे पुरुष नहीं क्या तुझमे जवानी नहीं
डरकर मरने से टकराकर मिटना होता है बेहतर
क्या तुमने सुनी ये अमर कहानी नहीं
उठ अगर तेरे अन्दर अभिमान बाकि है
छोर दे कायरता को गर स्वाभिमान बाकि है
उठ और दृष्टि खोल के देख दुश्मन तुम्हे ललकार रही
जाग ओ भारत के बेटे माँ भारती पुकार रही

दलाल लगे कविता करने, कविराज गए जंगल चरने

दलाल लगे कविता करने, कविराज गए जंगल चरने
तिरकम के लाखो गेट यहा, मालिस का उचा रेत यहाँ
नेता से मुश्किल भेट यहाँ, मंत्री का भरी पेट यहाँ
बन गए मूर्ख विद्वान यहाँ, गंजे बन गए महान यहाँ

सब नर स्वतंत्र नारी स्वतंत्र, कपरे की सब धारी स्वतंत्र
मोटर स्वतंत्र गारी स्वतंत्र, कपरे की सब धारी स्वतंत्र
पिछला जो कुछ था झूठा है, अगला ही सिर्फ अनूठा है
अनु फ़ैल फ़ैल कर फूटा है, दस्तखत की जगह अंगूठा है

अभिनेत्री बनती हैं सीता जी, अखवार बने हैं गीता जी
गिदर कुर्सी पा जाते हैं, चम्गादर मौज उराते हैं
बगुले पते हैं वोट यहाँ, कौवे गिनते हैं नोट यहाँ
बन्दर ही जग का राजा है, भोपू ही बढ़िया बाजा है

इश्क की गहराई में मै कुछ इस कदर खो गया

इश्क की गहराई में मै कुछ इस कदर खो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया
पहले तो जिन्दगी हमारी हर मोर पर मुस्कुराती रही
महबूब की बाते सुन सुन के हँसती रही गाती रही
उनकी आँखों में डूब के सदिया बीतती जाती रही
उनके धरकनो की जुवा ही हमें समझ में आती रही
जबसे दूर हुए वो हमसे अश्को का समंदर हमें डुबो गया
हसरतें बची न कुछ भी और आरजू भी खो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया

रौशनी की बात छोरो अंधेरो में भी दिल जलने लगा
काबू रहा न खुद पे कोई साँस भी रुक रुक कर चलने लगा
दिल में जबसे वो याद बन कर छाने लगी
तन्हाई हुयी संगदिल इतनी की हमें महफ़िल से डराने लगी
चांदनी रात में भी चाँद मेरा सो गया लगी
एक आग दिल में और जिन्दगी खाक हो गया
पाने को महफ़िल चले थे और तन्हा हो गया................

जिंदा है मगर कहाँ जिन्दगी है तेरे बगैर

जिंदा है मगर कहाँ जिन्दगी है तेरे बगैर
क्या बताएं खुदा से क्या बंदगी हैं तेरे बगैर
जिंदा है मगर कहाँ जिन्दगी है तेरे बगैर

एक तेरे वादे के खातिर ही हम जहाँ में हैं
वरना दुनिया में होना भी शर्मिंदगी है तेरे बगैर,
कहा था तुमने साथ चलेंगे हर पथरीली राहों पर
दर्द एक सा होगा हमे एक दूजे की आहो पर
हमारा तो बस आसरा होगा एक दूजे की पनाहों पर
चढेगे तो साथ चढेगे हम दुनिया के निगाहों पर
देखो आज घेर रहा ज़माने की दरिंदगी है तेरे बगैर
जिंदा है मगर कहाँ जिन्दगी है तेरे बगैर

मौत के इंतजार में बस जीने का हौसला चाहिए

क्या कहे हमें जिन्दगी से क्या चाहिए
मौत के इंतजार में बस जीने का हौसला चाहिए
न चाहिए रौशनी न ख़ुशी न रंग न किसी का संग
और न ही चमन से बहारों का सिलसिला चाहिए
मौत के इंतजार में बस जीने का हौसला चाहिए
अंधेरो में जीने की आदत है रौशनी का क्या करू
गम में पीने की आदत है ख़ुशी का क्या करू
ऐसे बेरंग जीवन को रंगो की क्या जरूरत है
खामोश लव ही ठीक है होठो की हसी का क्या करू
हमें अब बस वक़्त से मुकद्दर का फैसला चाहिए
मौत के इंतजार में बस जीने का हौसला चाहिए...........

मंगलवार, 8 जनवरी 2008

मगर मंजिल है कहाँ पता नहीं

दिनरात चल रहा हूँ मगर मंजिल है कहाँ पता नहीं
तुफा में घिरे मेरे जीवन का साहिल है कहाँ पता नहीं
खरे होकर चौराहे पर निहार रहा हूँ दूर तक
कौन सा राह जायेगा मंजिल तक हमें पता नहीं
वक़्त ने ऐसे मोर पे लाकर खरा किया है हमको
की कदम बढ़ रहे हैं हर वक़्त मगर किधर पता नहीं
मन में हौसला है और विश्वाश भी की पहुचेंगे एक दिन
मंजिल है कितनी दूर और पहुचेंगे कब तक पता नहीं ........

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..

मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

फूलों से जग आसान नहीं होता है..

रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..