सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

जीवन की नाव चलती जाती है

जीवन की नाव चलती जाती है
पतझर में सावन में रेत में सागर में

जीवन की नाव चलती जाती है
सोचते हैं लोग अभी उम्र ही क्या हमारी
मगर उम्र चुपके से ढलती जाती है
रूकती नहीं तूफानों में भी
ठोकर खाकर चट्टानों से भी
बढ़ती है बस बढ़ती जाती है

जीवन की नाव चलती जाती है
दास्ताँ अजीब है इस जीवन की भी
गम हो तो भी मुस्काती है
रोती नहीं कभी भी खुद पे ये
और न ही जीने वालो को रुलाती है
जो जीवन को समझ नहीं पाते
आंसू तो बस उनके हिस्से आती है,
जीते तो सब हैं मगर
जीवन के साथ सब नहीं जी पाते हैं
जिन्दगी गुलाम हो जाती है उसकी
जो जीवन को ख़ुशी से गले लगाते हैं,
इन्सान समझ जों ले इसे तो अच्छा है
ये बेफिक्र होकर बढ़ती जाती है
जीवन की नाव चलती जाती है

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